बद्रीनाथ देश के चारों कोनों पर स्थित चार धामों में से एक है – बद्रीनाथ

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जय बद्री विशाल
बद्रीनाथ देश के चारों कोनों पर स्थित चार धामों में से एक है – बद्रीनाथ। इसका सम्बन्ध सतयुग से है, जबकि अन्य धामों का त्रेता, द्वापर तथा कलियुग से। श्री बद्रीनाथ के हर युग में नाम भी अलग-अलग हैं। सतयुग में इसे मुक्तिप्रदा, त्रेता मंे योगसिद्धिदा, द्वापर में विशाला तथा कलियुग में बद्रिकाश्रम के रूप में जाना जाता है। स्कन्धपुराण में इससे सम्बन्धित श्लोक मिलता है- कृते मुक्तिप्रदा प्रोक्ता, त्रेतायाम् योगसिद्धिदा। विशाला द्वापरे प्रोक्ता, कलौ बद्रिकाश्रमम्।। मान्यता है कि इस धाम का महत्व तप के कारण से है। भगवान नारायण ने सृष्टि की रचना के पश्चात् जगत को कर्म मार्ग पर अग्रसर करने की भावना से स्वयं यहां तप के पश्चात् विष्णु वाहन होने की पदवी प्राप्त की थी। नारद को काम जीतने की शक्ति यहीं प्राप्त हुई। राम, कृष्ण आदि अवतारी पुरूषों द्वारा भी तप हेतु यहां आने के प्रमाण मिलते हैं। इसी मार्ग पर पाण्डवों का स्वर्गारोहण सर्वविदित है। केदारनाथ मन्दाकिनी के पावन तट पर स्थित है, केदारनाथ। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ‘हिमालये तु केदारम्’ ऐसा उल्लेख है। यहां भगवान आशुतोष शिवशंकर सदा वास करते हैं। मन्दिर के गर्भगृह में भगवान शंकर ज्योतिर्लिंग स्वरूप शिला के रूप में स्थित हैं। इसके अग्रभाग में जगत्जननी पार्वती की सुशोभित प्रतिमा सहित अनेक मूर्तियां हैं तथा समीपवर्ती क्षेत्र में हंसकुण्ड, भैरवनाथ तथा नवदुर्गा आदि। यहीं कुछ दूरी पर बुराड़ी ताल, वासुकी ताल, भृगुपन्त्य तथा ब्रह्मकुण्ड आदि स्थित हैं, जो आध्यात्म तथा पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। वासुकी ताल में दुर्लभ पुष्प ब्रह्मकमल पाया जाता है। ये सभी स्थान केदारनाथ से 8 से 10 किलोमीटर की परिधि में हैं। मन्दिर के पार्श्व भाग में आद्यशंकराचार्य की समाधि है। इसे दण्डस्थल भी कहते हैं, जो सनातन धर्म की जीवन्तता का प्रतीक है। कपाट खुलने का महत्व कपाट खुलने के दिन का मुख्य आकर्षण उस दीपज्योति का दर्शन होता है, जो शीतकाल के लगभग छ: महीने पूजागृह में ज्योति अनवरत जलती रहती है। बद्रीनाथ तथा केदारनाथ मन्दिर के कपाट (द्वार) खुलने का लोकमान्य विधान आदिकाल से चला आ रहा है। यह मान्यता बनी हुई है कि कपाल बन्द होने पर छ: महीने देवपूजा तथा छ: माह मानव पूजा के लिये मन्दिर के द्वार खुले रहते हैं। वृहद् नारदपुराण में इसका उल्लेख है – लभन्ते दर्शनं पुण्यं, पापकर्म विवर्जिता षण्मासे देवते: पूज्या, षण्मासे मानवे।़तथा लम्बे कालखण्ड तक इस क्षेत्र के चारों तीर्थों-बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री के मन्दिरों की व्यवस्था संरक्षक के रूप में टिहरी नरेश देखते रहे हैं। बसन्त पंचमी के अवसर पर टिहरी दरबार (नरेन्द्र नगर) में रावल (मुख्य पुजारी) की जन्म कुण्डली को ध्यान में रखकर दिशाप्रस्थान तथा कपाट खुलने का मुहूर्त देखा जाता है। गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट सामान्य रूप से अक्षय तृतीया को ही खुलते हैं। कपाट खुलते समय टिहरी नरेश द्वारा रावल का तिलक किया जाता है, इसे तिलपात्र अभिषेक कहा जाता है। मन्दिर में जलने वाले ज्योति स्तम्भ निमित्त तेल की पिराई भी समारोहपूर्वक टिहरी नरेश के यहां से ही की जाती है।

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