संवेदना हमारी प्रकृति और जानवरों के प्रति कैसी

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मनोज शर्मा “मन” (संयुक्त महामंत्री इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती )
अभी मैं एक मित्र की दूकान पर सदर बाज़ार गया तो बातो बातो में उसने बताया की उसकी दूकान में बहुत मोटा चूहा आया था और उसकी फाइल व् कुछ कागज भी कुतर गयाथा , तो उसके नौकर ने बताया था की इस शैतान चूहे का क्या करे, तो उसने अपने नौकरों को कहा की उसे मूषक महाराज के नाम से पुकारे, तो नौकर उसको मूषक महाराज कहने लगे, तो फिर मालिक ने ४ – ५ दिन बाद पुछा तो नौकरों ने बताया की उस चूहे ने कोई नुकसान नहीं किया , फिर हमारे मित्र ने बताया की फिर मैं घर नाश्ता नहीं कर पाया था तो श्रीमती जी ने दाल के परांठे और दो कलाकंद के पेश मेरे लिए रख दिए थे की मैं दूकान पर जाकर खा लूँगा , तो जैसे ही मैंने वो नाश्ता खोला और सोचा की कुछ मूषक महाराज को भी दे दू , और तभी वो चूहा उसके सामने आकर उसे देखने लगा तो उसने उस दाल के परांठे में से आधा तोडा और उसके सामने रख दिया और कलाकंद में से भी आधा तोडा और उसके सामने रख दिया , वो चूहा उसको आराम से खाया और बाहर को चल दिया , तो हमारे मित्र ने उससे पुछा की मूषक महाराज जा रहे हो क्या, तो वो चूहा मुडा और सीडियो से उतर सदा के लिए चला गया , फिर मित्र ने बताया की ये बात उसने कटक के दौरान ट्रेवल के दौरान एक दूकानदार से सीखी थी, वहा वो लोग मिटटी की कटोरी में बासमती चावल पानी में डालकर हर कमरे में रख देते है वो चावल पानी में फूल जाता है और मीठा भी हो जाता है , और उसको चूहे खा लेते है और उसका कभी आज तक नुकसान नहीं हुआ है , उसने बताया की हमने इन जानवरों की जगह पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर लिए है और ये जानवर हमारे साथ समझोता कर अपनी जगह पर हमें रख भी रहे है हम फिर भी इनसे दुश्मनी निकालते है इनको गलिया देता है मारते है और कष्ट देते है , और ये हमारी सभी बाते समझते है पहले कभी हमला नहीं करते है, चाहे वो सांप हो, अब मेरी आँखों के सामने संवेदना जैसा शब्द गूंजे लगा था , की सिर्फ हमारे धर्म का व्यक्ति बिना किताबो का हवाला देता हुआ ऐसी बात कह सकता है और कर भी सकता है , गजब है हमारा हिन्दू धर्म जो कट्टरता नहीं जीना सिखाता है , हिन्दू धर्म में संवेदना है , दुसरे धर्मो के प्रति , जानवरों के प्रति , नदियों समुन्द्र के प्रति, इसको आज की पीड़ी अन्धविश्वास भी कहती है हर चीज को आप वैज्ञानिक कसौटी पे कस नहीं सकते , महसूस कर सकते है | आस्था तर्क नहीं मांगती , आस्था हर व्यक्ति का विषय हो सकता है| और मैं जो इन चूहों को देखते ही चूहेदान की तरफ भागता था एक सोच में डूबा वहा से चला आया | क्या आज के युग में भी ऐसे व्यक्ति है जो अभी भी जानवर में संवेदनाये ढूंढ रहे है , क्या ऐसा संभव है की हम उनकी इज्जत करे तो वो हमें नुक्सान नहीं पहुचाएंगे , क्या वो हमारी बातो को इतना समझते है, इन सब ख्यालो में खोया अपने घर चला आया | एक बात तो तय की मैं अब किसी जीव को कभी नहीं सताऊंगा |
मोब. 9871599113

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