कांग्रेस को नहीं मिल सकता दूसरा रमेश दत्ता

नई दिल्ली ( अश्वनी भारद्वाज )

दिल्ली की सियासत में रमेश दत्ता एक ऐसा नाम है जिसे हर कोई जानता है | और जाने भी क्यों ना आखिर पूरा जीवन जो लगा दिया था उन्होंने समाज सेवा में | वे पोलिटिकल कम सामाजिक ज्यादा थे | हर किसी के दुःख दर्द में खड़े रहना उनकी आदत में शुमार था | खुद गरीब थे लेकिन दिल के अमीर थे, और हजारों लोगों की दिल की धडकन थे | उनकी मौत ने ऐसे हजारों लोगों को असहाय बना दिया है जिनके लिए दत्ता साहब भगवान से कम नहीं थे | हों भी क्यों ना उनके सुख दुःख में खड़े रहना, खुद को खाना मिले या ना मिले लेकिन कोई भूखा न सोये, उनके अपने तन पर कपड़े हो या नहीं हो लेकिन कोई निर्वस्त्र न रहे | इन सब चीजों का ध्यान रखते थे वे | खाने पीने से ले गरीबों को कपड़े, उनके तीज त्यौहार पर मिठाई तक का इंतजाम करते थे दत्ता साहब | इतना ही नहीं उनके निर्वाचन क्षेत्र में किसी गरीब परिवार में कोई शादी होती थी तो वहां आर्थिक मदद के साथ-साथ वे कार सेवा भी करते थे | बारात आने से पहले सफाई कराना, चूना छिडकवाना, पानी का टैंकर मंगवाना उनके रोजमर्रा के काम थे | बारात का स्वागत करना, खाना खिलवाना जाने और क्या-क्या काम करते थे वे सबके लिए |
खुद फकीरों की तरह जीवन जीने वाले दत्ता साहब इतने सब इंतजाम कैसे करते थे ये सोचने की बात है | निगम पार्षद तो वे लगभग चालीस साल से थे | ज्यादातर समय वे जोन के चेयरमैन भी रहे इसके अलावा निगम की कई महत्वपूर्ण समितियों में वे अक्सर रहते थे | कुछ समय के लिए डिप्टी मेयर भी रहे | लिहाजा उनका जनसम्पर्क अच्छा खासा था | काफी धनाढ्य लोग उनके सम्पर्क में थे | निगम अधिकारी भी उनसे कांपते थे यानि जिसकी जो जिम्मेदारी लगा दी क्या मजाल कोई उनकी बात काट दे | और कोई कांटता भी क्यों हजारों लोगो को ऑबलाईज कर रखा था उन्होंने और वो भी मुफ्त में | गरीबों की सेवा के अलावा उनकी कोई फटीक होती भी नहीं थी | और फिर सबको मालूम होता था कि वो अपने लिए कुछ नहीं मांग रहे लिहाजा लोग दान पुन समझ कर भी उनके कहने को नहीं टालते थे | ना केवल कांग्रेस अपितु सभी पार्टियों के नेता उनका दिल से सम्मान करते थे | भ्रष्ट अफसरों को छोड़ श्री दत्ता सबको मान सम्मान देते थे | भ्रष्ट अफसरों को तो वे न केवल हड़का के रखते थे बल्कि कभी कभार तो तमाम मर्यादाएं तोड़ उनकी अच्छी खासी क्लास भी ले लेते थे |
वे किसी महत्वपूर्ण पद पर हों या नहीं लेकिन यदि किसी पर नाराज हो गये तो उसका बचना मुश्किल ही था | क्योंकि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी उनकी बात को तरजीह देते थे | जहां तक उनके ताल्लुकात का सवाल था इंद्रा गाँधी से ले मनमोहन सिंह तक कोई भी प्रधानमन्त्री रहें हों उन्हें बाई नेम जानते थे और उनकी बात नहीं टालते थे | उन्होंने गरीबों की सेवा के लिए नेहरु बिर्गेड नाम से एक संस्था बना रखी थी मिन्टो रोड पर एक पार्क में उन्होंने नेहरु हिल भी बना रखी थी जहां से वे अपनी गतिवधियां चलाते थे | इंद्रा गाँधी, राजीव गाँधी से ले चन्द्रशेखर, मनमोहन सिंह सहित तमाम दिग्गजों को वे नेहरु हिल बुला चुके थे | नेहरु बिर्गेड में उन्होंने करीब दो सौ लोग रखे हुए थे | जिन्हें वे कांग्रेस के हर प्रोग्राम में बाकायदा ड्रैस और बैंड के साथ ले जाया करते | इससे ही उनकी अलग पहचान बन गई थी | सभी सदस्यों की ड्रैस और खाने पीने का इंतजाम वे स्वयं ही किया करते थे |
कांग्रेस हाईकमान में मजबूत पकड़ के चलते दिल्ली कांग्रेस की लीडरशिप उनसे किनारा ही करती थी | लोकल लीडर ये कभी नहीं चाहते की कोई सीधे हाईकमान तक पहुंच बनाये | शायद इसीलिए वो श्री दत्ता को कोई बड़ी जिम्मेदारी देने से कतराते थे | लेकिन वे जो मिल गया उसी में खुश रहते थे | बावजूद इसके दिल्ली के तमाम बड़े नेताओं के यहां वे अपनी बिर्गेड लेकर पहुंचते थे और उनकी जय-जय कार करते थे | शीला दीक्षित जी जब उत्तर पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ी मैं अपनी विधानसभा रोहताश नगर से उनका चुनाव प्रभारी था तो दत्ता जी नें कहा मैं कुछ दिन आपके साथ मैडम के लिए काम करूंगा उनकी मजबूत टीम को देखते हुए मैंने तुरंत हामी भर दी और उन्हें शीला जी के पास ले गया | शीला जी उन्हें पहले से ही जानती थी | शीला जी ने कहा आप नई दिल्ली में ही काम करो | आपकी भावनाओं की मैं कद्र करती हूं लेकिन आप धवन जी के यहां पूरी मेहनत से काम करो | दत्ता जी में एक खास बात और थी वे गुटबाजी की राजनीत नहीं करते थे | दिल्ली कांग्रेस के सभी गुटों में उनका सम्मान था और वे सभी के यहां पहुंचते थे | लेकिन अपने लिए कभी भी किसी से कुछ मांगते नहीं थे | हालांकि उनके अड़ियल स्वभाव के चलते कुछ नेता उनसे कन्नी काटा करते |
दत्ता जी के बारे में मैं बहुत कुछ जानता हूं, काफी कुछ क्या उन पर पुस्तक भी लिख सकता हूं लेकिन आज बस इतना ही बाकी मेरी उनसे कैसे मुलाकात हुई और उनके कुछ निजी संस्मरणों का जिक्र मैं कल अपने दूसरे लेख में करूंगा | आज इतना ही कहना चाहूंगा यारों के यार थे रमेश दत्ता | ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें | “एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा, आँखे हैरान हैं क्या शख्स जमाने से उठा”…….

कोई जवाब दें