जब वर्करों के लिए गवर्नर तक से भिड़ गये थे रमेश दत्ता

नई दिल्ली ( अश्वनी भारद्वाज )

कांग्रेस के दिवंगत जुझारू नेता रमेश दत्ता अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके संस्मरण जिन्दा है और हमेशा रहेगें | और रहने भी चाहिए , क्योंकि वे कर्मठ एवं जीवट इंसान थे | भय उनके आसपास भी नहीं मंडराता था | यह बात अलग है वो सभी से शालीनता से पेश आते थे लेकिन जो उनसे अड़ गया समझो वो कहीं का नहीं रहा | उसकी ऐसी बाट लगाते थे कि जीवन भर वो याद रखता था | हालांकि लोग उनके स्वभाव और रसूकों को जानते थे लिहाजा हर कोई उनसे पंगा भी नहीं लेता था |
दिल्ली में एच.के.एल.भगत के अलावा केवल रमेश दत्ता ही ऐसे नेता थे जिन्हें प्रधानमन्त्री कार्यालय से तुरंत समय मिल जाता था | इंद्रा जी से ले मनमोहन सिंह तक रमेश दत्ता का यह जलवा कायम था | मेरी उनसे मुलाकात भगत जी ने ही कराई थी उन दिनों मैं छात्र संघ में अध्यक्ष था उसी दिन से दत्ता साहब मेरे अच्छे मित्र बन गये थे बाद में जब मैं पत्रकारिता में आया तो उनसे लगभग रोज ही मिलना होता था | बात उन दिनों की है जब मैं दैनिक वीर अर्जुन में था मेरा एल.जी.साहब से मुलाकात का समय था | मैं जैसे ही रिसेप्शन पर पहुंचा वहां दत्ता साहब अपने 30 – 35 लोगों के साथ बैठे थे | मुझे देखते ही डैडी – डैडी करने लगे दरअसल ये उनका तकिया कलाम था वे लगभग हर दूसरे आदमी को इसी सम्भोधन से बात करते थे | कहने लगे आप पहले मिल लो मुझे तो लम्बी बात करनी है |
जब मैं एल.जी.साहब के रूम में पहुंचा तो वे बोले दत्ता जी नहीं आये क्या | उनके स्टाफ नें बताया अभी उनके कुछ लोग आने बाकी हैं वो बाहर इंतजार कर रहे हैं | एल.जी.साहब नें पूछा कितने लोग है तो उन्हें बताया गया करीब 40 लोग है | यह सुन वो बोले केवल तीन चार लोगो को बुलवा लो | लेकिन श्री दत्ता ने उनकी एक नहीं सुनी और पूरी पलटन के साथ भीतर आ धमके | भीतर आते ही कहने लगे आप जनता के एल.जी.हो राज निवास नहीं ये जन निवास है | लोग अपनी बिजली,पानी सड़कों की समस्या बताने लगे | एल.जी. कहने लगे मैं इस काम के लिए हूं क्या | दत्ता साहब ने सवाल किया तो किस काम के लिए हो इस पर एल.जी.भडक गये और बोले आप पूछने वाले कौन होते हो | बस फिर क्या था रमेश दत्ता का पारा सातवें आसमां पर पहुंच गया | और उन्होंने अपने साथ आये लोगो को झाड़ते हुए कहा मेरा काम गली खड़न्जे बदलवाना नहीं हैं चलो यहां से मैं तो एल.जी.बदलवाता हूं |मामला बिगड़ते देख मैनें उन्हें शांत किया और जिस काम से मैं गया था वो तो बीच में ही लटक गया उनकी सुलह कराने में ही सारा समय चला गया | बाद में पता चला एल.जी.साहब को ही बड़े स्तर पर सफाई देनी पड़ी | ऐसे थे रमेश दत्ता लोगो के लिए बड़ी से बड़ी हस्ती से टकरा जाते थे | एक बार मैं मिन्टो रोड से किसी मित्र के साथ जा रहा था कि हमारी मोटरसाईकिल में पंचर हो गया दोपहर का समय था दूर-दूर तक पंचर लगाने वाला नहीं था | तभी मेरे मन में आया नेहरु हिल चलते हैं | वहां पहुंचने पर हमें दत्ता जी मिल गये फिर क्या था उन्होंने हमारी खूब खातिर की और नगर निगम के एक इंजीनियर को बाईक में पंचर लगवाने भेज दिया | जब वो साहब आये तो मैनें ईशारे में पैसे पूछ लिए उन्होंने 20 रूपये बताए | फिर क्या था चढ़ गये उन पर राशन पानी लेकर और धरती के तमाम श्लोक सुना डाले उन्हें और पूछने लगे तुम जो अवैध कमाई करते हो मैंने तुमसे चवन्नी मांगी है कभी तुम मेरे गैस्टों से 20 रूपये के लिए हाथ फैला रहे हो |
नेहरु हिल से दत्ता जी हमें अपने घर ले गये जहां उनकी माता जी भी थी | उनका घर देख हमें बड़ी हैरानी हुई जर्जर हाल घर जहां शायद दस-पन्द्रह साल से सफेदी भी नहीं हुई थी | बैठने को मात्र एक चारपाई, एक तख्त और चार – पांच ट्रंक जिमें नेहरु बिर्गेड के वर्करों की ड्रैस रखी थी | स्लैप पर दस पन्द्रह बॉक्स रखे थे जिनमें लोगो के विजिटिंग कार्ड रखे थे | हर बॉक्स पर पहचान के लिए लिखा था किसमे किसके कार्ड है मसलन डॉ.वाले में डॉ.के नेता वाले में नेता के पत्रकार वाले में पत्रकार के | यानी डायरी तक नहीं थी उनके पास ,न घर में फोन था और न ही मोबाईल | पूरे दिन थ्री व्हीलर में घूमते थे लोगों के काम कराते | ऐसे थे रमेश दत्ता | मिलेगा आज के जमाने में कोई नेता ऐसा |
दत्ता जी को छपास का भयंकर शौक था छोटे से ले बड़े प्रोग्राम को वे अख़बार में छपवाना चाहते थे | जब मैं पंजाब केसरी पहुंच गया तो भयंकर बीमारी की हालत में भी ग्लूकोस की बोतल लगी होने के बावजूद वजीरपुर तक पहुंचते थे | उनकी हालत और व्यवहार देख हम भी उनकी खबर छापने में कोई कंजूसी नही करते थे |दत्ता जी अलविदा बोल गए, लेकिन उनकी यादें जिन्दा है | दत्ता जी के जीवन पर कुछ ये फिट बैठता है : मुख्तसर सा गरूर भी जरूरी है जीने के लिए — ज्यादा झुक कर मिले तो दुनिया पीठ का पायदान बना लेती है | अंत में उन्हें श्रधांजली देते हुए नमन करते हुए : बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई – एक शक्श सारे शहर को वीरान कर गया | ॐ शांति ॐ

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