आचार्य चंदना की साधुता का रचनात्मक संसार

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ललित गर्ग

आचार्य चन्दनाजी जैनधर्म में दीक्षित पहली जैन आचार्य हंै, जिन्होंने धर्म को नया परिवेश एवं आयाम दिया है, धर्म को रूढ़ता एवं पारम्परिकता से बाहर निकाल कर सेवा, शिक्षा, संस्कार, साहित्य के आयाम दिये हैं। उनके पुरुषार्थ की प्रभावी प्रस्तुति है वीरायतन। जिसकी देश एवं विदेश में लगभग 25 शाखाएं हैं, जिनमें 25 हजार विद्यार्थी 12 विद्यालय एवं 12 महाविद्यालय में अध्ययनरत है। अनेक चिकित्सा के उपक्रम संचालित है जिनमें लाखों नेत्र एवं अन्य रोगियों ने चिकित्सा लाभ लिया है। भारत सहित नेपाल एवं अन्य देशों में स्लम एरिया में शिक्षा एवं संस्कार का अनूठा कार्य, दस हजार से अधिक भूकम्पग्रस्त बालकों को अस्थाई स्कूलों में तात्कालिक शिक्षण, कच्छ, सुनामी, कोशी, सूरत, नेपाल इत्यादि की प्राकृतिक आपदाओं में हजारों लोगों का सहयोग कर आचार्य चन्दनाजी ने अपनी साधना एवं साधुता को रचनात्मक आकार दिया है।
आचार्य चन्दनाजी ने अधिकांश स्कूलें एवं चिकित्सा के केन्द्र उन क्षेत्रों में स्थापित किये हैं, जो पीढ़ियों से अशिक्षित, अभावग्रस्त एवं झोपड़ियों में रहने वाले लोग हैं। नेत्र ज्योति सेवा मन्दिरम् आपके द्वारा संचालित एवं विशिष्ट सेवा प्रकल्प है जिसमें अब तक तीन लाख आंखों के आॅपरेशन, पच्चीस लाख लोगों की नेत्र चिकित्सा, दो लाख लोगों की दंत चिकित्सा, बारह हजार तीन सौ की पोलियों चिकित्सा हो चुकी हैं। वीरायतन उनके द्वारा निर्मित एक रचनात्मक संसार है, जहां उन्होंने श्री ब्राह्मी कला मन्दिरम् में जैन संस्कृति एवं कला को मनोहारी एवं प्रभावी प्रस्तुति दी है, उनकी कल्पनाशीलता, प्रतिभा एवं ज्ञान तथा कुशल कारीगरों के सहयोग से जैन धर्म के बोध प्रसंगों को यहां उकेरा गया है। जिसे हर वर्ग एवं जाति के साठ लाख लोग देखकर अविस्मरणीय अनुभव कर चुके हैं। भगवान महावीर के जीवन एवं दर्शन की दिव्यता को सर्व-सामान्य तक पहुंचाने का यह कार्य अनूठा एवं विलक्षण है। वीरातयन महावीर की करूणा, अहिंसा एवं शांति के सन्देश का जीवंत स्वरूप है। बिहार की वीरान एवं उपेक्षित जगह पर अपरिचित लोगों के बीच वैभारगिरी की तलहटी के राजगीर में वीरायतन की स्थापना 1974 में हुई। यह एक अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक संगठन है जो जाति, पंथ, धर्म, क्षेत्र, भाषा या लिंग के प्रति भेदभाव के बिना दूसरों के लिए आध्यात्मिक विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सेवा-परोपकार के माध्यम से गरीब लोगों के बीच सामाजिक परिवर्तन का निर्माण कर रहा है। यह संस्थान पूरे भारत में वंचितों के लिए अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है। यह ऐतिहासिक कार्य महिला शक्ति (साध्वी-संघ) की ऊर्जा, प्रतिभा एवं क्षमताओं का विरल, अनूठा एवं दर्शनीय अध्याय है।
भारत की धार्मिक एवं आध्यात्मिक परम्परा में विदुषी महिलाओं, साध्वियों और ऋषिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। वर्तमान युग-चिंतन स्त्री-पुरुष के अलग-अलग अस्तित्व का न समर्थक है और न संपोषक। वह दोनों के सहअस्तित्व और सहभागिता का पक्षधर है। ऐसे महिला शक्ति के अनूठे कार्यों एवं सेवा प्रकल्पों के कारण ही इक्कीसवीं सदी को महिलाओं के वर्चस्व की सदी मानी जाती है। आचार्य चन्दनाजी ने विभिन्न दिशाओं में सृजन की ऋचाएं लिखी हैं, नया इतिहास रचा है। अपनी योग्यता और क्षमता से स्वयं को साबित किया है। उन्होंने सेवा से लेकर साधना तक अपनी हिम्मत और हौसले की दास्तान लिखकर सिद्ध कर दिया है कि महिलाएं जिस कुशलता से घर का संचालन करती हैं उसी कुशलता से वे धर्म, शिक्षा, सेवा, चिकित्सा आदि हर क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का उपयोग कर सकती है।
आचार्य चन्दनाजी ने इन वर्षों में अध्यात्म के क्षेत्र में एक छलांग लगाई है और जीवन की आदर्श परिभाषाएं गढ़ी हैं। उन्होंने अध्यात्म की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों और जीवनमूल्यों से प्रतिबद्ध होकर एक महान विभूति के रूप में चैतन्य रश्मि का, एक आध्यात्मिक गुरु का, एक ऊर्जा का सार्थक परिचय दिया है। वे जैन धर्म के प्रमुख स्थानकवासी संप्रदाय में 14 वर्ष की उम्र में दीक्षित होकर राष्ट्रसंत अमरमुनिजी महाराज की महनीय कृति के रूप में लोकप्रिय है। इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना हुई जब पुरुषप्रधान समाज में संपूर्ण जैन धर्म में पहली बार किसी साध्वी को आचार्य बनने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ है। आचार्य वही जो समाज को सही दिशा दे, नये आयामों को स्थापित करे और आचार्य चंदनाजी में ये सारे गुण सहज ही विद्यमान हैं। वे त्याग, तपस्या, तितिक्षा, तेजस्विता, बौद्धिकता, परोपकारिता की प्रतीक हैं, प्रतिभा एवं पुरुषार्थ का पर्याय हैं।
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’- मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। ज्योति की यात्रा मनुष्य की शाश्वत अभीप्सा है। इस यात्रा का उद्देश्य है, प्रकाश की खोज। प्रकाश उसे मिलता है, जो उसकी खोज करता है। कुछ व्यक्तित्व प्रकाश के स्रोत होते हैं। वे स्वयं प्रकाशित होते हैं और दूसरों को भी निरंतर रोशनी बांटते हैं। आचार्य चंदनाजी ऐसा ही एक लाइटहाउस है यानी प्रकाश-गृह है, जिसके चारों ओर रोशनदान हैं, खुले वातायन हैं। प्रखर संयम साधना, श्रुतोपासना और आत्माराधना से उनका समग्र जीवन उद्भासित है। आत्मज्योति से ज्योतित उनकी अंतश्चेतना, अनेकों को आलोकदान करने में समर्थ हैं। उनका चिंतन, संभाषण, आचरण, सृजन, संबोधन, सेवा- ये सब ऐसे खुले वातायन हैं, जिनसे निरंतर ज्योति-रश्मियां प्रस्फुटित होती रहती हैं और पूरी मानवजाति को उपकृत कर रही हैं। उनका जीवन ज्ञान, दर्शन और चरित्र की त्रिवेणी में अभिस्नात है। उनका बाह्य व्यक्तित्व जितना आकर्षक और चुंबकीय है, आंतरिक व्यक्तित्व उससे हजार गुणा निर्मल और पवित्र है। वे व्यक्तित्व निर्माता हैं, उनके चिंतन में भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित है।
आचार्य चंदनाजी का जन्म 26 जनवरी 1937 को महाराष्ट्र के चस्मान गांव में कटारिया परिवार में हुआ था। उनकी मां, प्रेम कुवर और पिता माणिकचंद ने उनका नाम शकुंतला रखा। चस्मान में तीसरी कक्षा तक उन्होंने औपचारिक शिक्षा ग्रहण की। इन्होंने 12 वर्षों में प्रयाग से साहित्य रत्न, भारतीय विद्या भवन-मुंबई से धार्मिक परीक्षा की आचार्य डिग्री, वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से व्याकरण के साथ शास्त्री की उपाधियां प्राप्त कीं। उन्होंने संतता एवं साधना को सेवा का आयाम दिया है, उनकी दीक्षा एक संकल्प है मानव जीवन को सुंदर बनाने का, लोगों की भलाई और कल्याण का एवं स्वयं के कल्याण के साथ-साथ परकल्याण का। इससे संसार से सम्बन्ध टूटता नहीं बल्कि परमात्मा से जुड़ आत्म-साधना द्वारा जीवन पूर्णतः मानव उत्थान, समाज कल्याण, सेवा, दया और सद्मार्ग के कर्मों का पर्याय बन जाता है।

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