बच्चा मन का सच्चा

0
8

नई दिल्ली ( सुधीर कुमार शर्मा )

बच्चा मन का सच्चा
कुछ अल्हड़ सा कुछ चंचल सा, फिर भी अच्छा लगता है
है ऐसा चितचोर कि ये तो, सबके मन को ठगता है

है शरारती मगर वो मन से, बिलकुल सच्चा होता है
इतना सुन्दर मासूम तो, केवल बच्चा होता है

नफरत की जहरीली छुरियां, इसके मन को काट न पाती हैं
भेदभाव की दीवारें, उपवन को बाँट न पाती हैं

इसका चेहरा इसके मन का, एक दर्पण होता है
हँसता है तो, बालकृष्ण का दर्शन होता है

निर्मल, निश्छल, निर्विकार मन में कुछ कलुष ना होता है
इसका मन सुन्दर सतरंगी, इंद्र धनुष सा होता है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here