सुभाष चोपड़ा को कप्तान बना बगावत रोक दी सोनिया ने

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नई दिल्ली ( अश्वनी भारद्वाज )

दिल्ली कांग्रेस के पुराने खिलाडी सुभाष चोपड़ा को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौप कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने दिल्ली में सम्भावित बगावत पर लगाम लगाने का काम किया है | शीला दीक्षित के निधन के बाद राजधानी दिल्ली में कांग्रेस की हालत दिन प्रतिदिन उस बेल के समान होती जा रही थी जिसे काफी समय से सींचा नही जा रहा था और वह लगातार सूखती जा रही थी | ऐसे में सुभाष चोपड़ा की नियुक्ति किसी बड़े हुनरमंद से कम नहीं आंकी जा रही | पार्टी को उनसे यह उम्मीद है जिस बेल को हरा भरा छोड़ शीला दीक्षित इस दुनिया से रुक्सत हुई थी वो बेल फिर से न केवल हरी भरी होगी बल्कि फले फूलेगी भी |
उल्लेखनीय है कि पिछले कई चुनावो से कांग्रेस लगातार तीसरे पायदान पर आ रही थी लेकिन शीला दीक्षित के नेत्रत्व में हुए लोक सभा चुनावों में पार्टी दूसरे नम्बर पर पहुंच गई थी और उम्मीद जताई जा रही थी जल्द कांग्रेस अपना खोया जनाधार हांसिल कर लेगी | कांग्रेस ने फैंसला लेने में देर तो की लेकिन देर आए दुरस्त आए | सुभाष चोपड़ा एक ऐसा नाम था जिस पर किसी को ऐतराज नहीं हो सकता था | पूर्व में अध्यक्ष रहे सुभाष के समय निगम चुनावों में कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी | दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष के साथ साथ सुभाष चोपड़ा दिल्ली विधान सभा के स्पीकर भी रहे हैं लिहाजा उनका कद अन्य दावेदारों पर भारी पड़ना स्वभाविक था | 72 साल की उम्र होने के बावजूद यूथ लीडरशिप पर उनकी पकड़ किसी से छिपी नहीं हैं | अपने पिछले कार्यकाल में निर्विवाद रहना उनका सबसे बड़ा प्लस पवाइंट रहा | दूसरी ओरअजय माकन रहें हो या जे.पी. अग्रवाल, प्रेम सिंह या रामबाबू शर्मा किसी की भी शीला दीक्षित से पटरी नहीं बैठी जबकि सुभाष चोपड़ा के साथ अध्यक्ष रहते हुए भी और स्पीकर रहते हुए भी शीला दीक्षित से उनका तालमेल ठीक रहा | ये तमाम तथ्य पार्टी हाईकमान की नजर में थे |
पार्टी के प्रभारी महासचिव पी.सी.चाको ने भी सुभाष चोपड़ा का नाम कम से कम दूसरे नम्बर पर तो सुझाया ही था, यह भी उनके पक्ष में गया | कीर्ति आजाद का नाम एका एक उछलने पर कांग्रेस में लगभग बगावत के हालत बन गये थे | आलम ये था की कई बड़े नेता पार्टी से किनारा करने तक का मूड़ बना चुके थे | सूत्रों की मानें तो एक पूर्व सांसद और दिल्ली सरकार के दो पूर्व मंत्रियों के पाला बदलने तक की खबर थी | इतना ही नहीं कुछ पूर्व विधायक तो बाकायदा स्क्रिप्ट तक लिख चुके थे बस रवानगी बाकी थी | लेकिन पार्टी आलाकमान तक जब ये बातें पहुंची तो इन हालातो से निपटने के लिए केवल एक ही नाम सामने आया | और वो नाम था सुभाष चोपड़ा |
छात्र राजनीति के धुरंधर रहे सुभाष चोपड़ा ने दिल्ली की सियासत को बड़ी बारीकी से देखा है | एच.के.एल. भगत से ले आर.के. धवन, शीला दीक्षित जैसे दिग्गजों से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है | सबको साथ लेकर चलना उनकी फितरत मानी जाती है | महानगर परिषद से ले विधान सभा तक उनका कार्यकाल भी किसी से छिपा नहीं है | दिल्ली कांग्रेस अधक्ष तथा विधान सभा अध्यक्ष पद पर रहते हुए विपक्ष से भी उनके तालमेल में कमी नहीं रहना इस बात का संकेत है कि वे हर किसी से तालमेल बिठाने में माहिर माने जाते हैं | पार्टी हाईकमान ने तो अपना काम कर दिया अब सुभाष चोपड़ा को न केवल अपना रोड मैप तैयार करना है बल्कि उसे अमलीजामा भी पहनना है | पार्टी के भीतर गुना भाग करने में उन्हें दिक्कत नहीं आने वाली | लेकिन सत्ता के सभी गलियारों से बाहर चल रही पार्टी को खड़ा करने और विपक्षी रणनीति को भेदने के लिए उन्हें कड़ी मशक्कत करनी होगी | आज बस इतना ही……

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