तो क्या भाजपा दिल्ली में खाता भी नही खोल पायेगी : दंगल 2019

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नई दिल्ली ( अश्वनी भारद्वाज )
यदि ऐसा हो गया तो भाजपा लोक सभा चुनावों में राजधानी दिल्ली में अपना खाता भी नहीं खोल पायेगी | और विपक्षी खेमा सभी सातों सीटों पर जीत का परचम फहरायेगा| जी हां यह सम्भव है | और यदि तालमेल में कोई चूक नही हुई तो ऐसा होने जा रहा है | दिल्ली की सियासत अजीब है यहाँ पहले भी ऐसा होते रहा है |
          डूसू चुनाव में भले ही विधार्थी परिषद की जीत से भाजपा की बाछें खिली हैं और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तक ने बयान दे डाला यह राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति आस्था की जीत है | लेकिन छात्र संघ चुनाव व आम चुनाव में जमीन आसमान का अंतर है |
अगले साल लोक सभा चुनाव होने हैं भाजपा की असली परीक्षा यानी अग्नि परीक्षा उस चुनाव में होनी हैं | राजधानी दिल्ली की सत्ता से दो दशक से बाहर भाजपा २०१४ में मोदी लहर के चलते भले ही दिल्ली की सातों सीटें जीत गई थी |
          लेकिन २०१९ भाजपा के लिए आसान नहीं हैं | देश भर में भाजपा के सामने विपक्षी एकजुटता सबसे बड़ी बाधा इस बार रहने वाली है और भाजपा के लिए ज्यादातर राज्यों में विपक्षी रणनीति को भेद पाना आसान नही होगा | ऐसे में दिल्ली भी अछूती नही रहने वाली | हालाँकि अभी दिल्ली में विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस व आम आदमी पार्टी ही आती हैं | और दोनों का लक्ष्य भाजपा को लपेटना  है |ऐसे में इन दोनों पार्टियों के तालमेल से चुनाव लड़ने की सुगबुघाहट कुछ माह से चर्चा में है |
यह बात अलग है कि अभी तक दोनों ओर से इस बाबत पहल नही हुई है | लेकिन माना जा रहा है मोदी रथ को रोकने के लिए चुनाव से पूर्व यह गठ्बन्धन हो ही जायेगा |जहाँ आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल नरेंद्र मोदी को दुश्मन नम्बर वन मानते हैं वहीं राहुल गाँधी के लिए कांग्रेस के साथ-साथ विपक्षी खेमे की मजबूती भी मजबूरी है | राहुल भली भांति जानते हैं दिल्ली में बिना केजरीवाल के वे एक भी सीट जीतने की हालत में नही हैं | दिल्ली में कांग्रेस का मत प्रतिशत जरुर बढ़ा है लेकिन अभी कांग्रेस जीत सकने की पोजीशन में नही हैं |
          हाँ इतना जरुर है यदि कांग्रेस अकेले लडती है तो अपने साथ-साथ आम आदमी पार्टी की लुटिया भी डुबो देगी | जैसा २०१४ में भी हुआ था | उस वक्त मोदी लहर में भाजपा को दिल्ली में 46 .40 फीसदी वोट मिले थे जबकि आम आदमी को 34 .90 और कांग्रेस को 15.10 फीसदी वोट मिले थे | यानी मोदी लहर में भी दोनों साथ मिलकर लड़ते तो भाजपा को हर सकते थे | उस वक्त भी दोनों को पचास फीसदी वोट मिले थे | और आज न तो मोदी लहर है और न ही कांग्रेस उतनी कमजोर |
          इसी तरह २०१७ के निगम चुनावो में भाजपा को जहाँ 37 फीसदी वोट ही मिले थे तो आप को 26 व कांग्रेस को 21 यानि दोनों को मिलाकर कुल 47 फीसदी भाजपा से दस फीसदी ज्यादा वोट मिले थे | यदि यह चुनाव भी मिलकर   लड़ते तो भाजपा को एक भी निगम में सत्ता हांसिल नही होती | आंकड़ो से स्पस्ट है यदि लोक सभा चुनावो में आम आदमी पार्टी व कांग्रेस मिलकर चुनाव लडती है तो दिल्ली में भाजपा शायद ही  खाता भी खोल पाए |
          हालाँकि आप व कांग्रेस में तालमेल को ले दिल्ली कांग्रेस बंटी हुई है सूत्रों की माने तो प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन जहाँ तालमेल के विरोध में है वहीं  शीला दीक्षित पार्टी को समझा रही है बिना तालमेल के लड़ने का मतलब अपने खाते की सात सीटें कम करना हैं ऐसे में राहुल गाँधी किसी भी कीमत पर एक भी सीट नही गवाना चाहेंगे |भले ही उने गठ्बन्धन की कीमत चुकानी पड़े |सूत्रों की माने तो ममता बनर्जी  शत्रुघन सिन्हा समेत कई अन्य विपक्षी नेता भी यही चाहते है कि वोटों का बटवारा न हो | यानी कुल मिलाकर कांग्रेस व आप में तालमेल के ज्यादा आसार नजर आ रहे हैं अरविन्द केजरीवाल भी  निगम चुनावो की हालत देख समझ चुके हैं अकेले लड़ने का कोई लाभ नही है………

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