यकीन नहीं आ रहा कि शीला जी आप चली गई ( संस्मरण एवं श्रधांजलि )

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नई दिल्ली ( अश्वनी भारद्वाज )

आज से करीब सात आठ माह पूर्व जब शीला जी दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष भी नहीं बनी थी मैं पूर्व विधायक राधे श्याम खन्ना के पुत्र व् मेरे परम मित्र रवि खन्ना के साथ शीला जी से उनके निवास पर मिलने गया था तब मैंने उनसे कहा था कि मैं आपकी जीवनी पर एक पुस्तक लिखना चाहता हूं इसके लिए आपको मुझे कुछ सामग्री देनी होगी और इस काम के लिए मुझे आपके साथ कुछ सीटिंग्स करनी होगी तो उन्होंने कहा अभी रुक जाओ अभी मेरी जीवनी का एक अध्याय बाकी है उसे पूरा होने दो तब लिख लेना | और आज हालत यह है की उनके बारे में चंद लाइनें लिखते हुए मेरे हाथ कांप रहे हैं | लेकिन हिम्मत करके श्रधांजलि स्वरूप कुछ संस्मरण साझा करने जा रहा हूं |
यकीन नहीं आ रहाकि शीला जी हमारे बीच नहीं रही | तीन दिन पूर्व ही मैं उनसे जब मिला था तो कतई आभास नहीं था की ये उनसे आखरी मुलाकात होगी | मेरे पैरों में तकलीफ देख वे कहने लगी लिफ्ट से उतर जाओ | लेकिन मैंने कहा मुझे कोई दिक्कत नहीं हैं | हालांकि शीला जी कुछ समय से बीमार थी बावजूद वे अपने घर आने-जाने वालों से दिल खोलकर मिलती थी और उनसे चर्चा करती थी | इतना ही नहीं वे लोगों के सुझावों पर अमल भी करती थी | मेरा शीला जी से परिचय करीब 22 वर्ष पूर्व उस वक्त हुआ था जब शीला जी पूर्वी दिल्ली से लोक सभा का चुनाव लड़ी थी और मैं रोहताश नगर ब्लाक कांग्रेस का अध्यक्ष था | उस चुनाव में शीला जी ने मुझे रोहताश नगर विधान सभा का अपना इलेक्शन इंचार्ज बनाया था | उन दिनों मैं वीर अर्जुन अख़बार में काम करता था |
पार्टी कार्यकर्ता तथा एक बड़े अख़बार के जर्नलिस्ट होने के नाते मेरा उनसे पार्टी प्रोग्रामों के अलावा प्रेस ब्रीफिंग में अक्सर मिलना होता था | वे इतनी शालीन थी की मेरी उम्र उनके पुत्र संदीप जी के बराबर होगी लेकिन हमेशा नाम के आगे जी लगाकर पुकारती थी | ये व्यवहार उनका हर किसी के प्रति रहता था | दिल्ली में उन्होंने कितना विकास किया इस पर आज मैं नहीं लिखना चाहता क्योंकि ये किसी से छिपा नहीं है खुद प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी ने दिल्ली के विकास की देवी कहकर उन्हें श्रधासुमन अर्पित किये हैं | लेकिन इतना जरुर लिखुंगा उन्हें दिल्ली की शाहजहाँ कहूँ तो गलत नहीं होगा | ऐसा इसलिए जिस तरह शाहजहाँ की हकुमत में दिल्ली में 24 घंटे निर्माण कार्य हुआ करते वैसे ही शीला जी के शासन में दिन रात दिल्ली में विकास होते थे |
शीला जी विपक्ष का भी बहुत सम्मान करती थी स्वयं भाजपा के कई विधायक व सांसद शीला जी की कार्यशैली के कायल थे और कहा करते हम शीला जी को जो भी काम बताते हैं वे हमेशा उन्हें प्राथमिकता के आधार पर निर्देश देकर पूरा कराती हैं | इतने काम तो हम अपनी सरकार में भी नहीं करा पाते थे | सांसद विजय गोयल ने कहा हम जब भी उन्हें अपने घर आमंत्रित करते थे वो चली आती थी | वर्करों के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते थे वे एक-एक वर्कर की बात सुनती थी | खास बात ये थी कि वे किसी से नाराज नहीं होती थी | और यदि किसी की बात उन्हें बुरी लगती थी तो उसे उसी वक्त समझा देती थी और अपने दिल में नहीं रखती थी |
एक बार मैंने उन्हें इसी चुनाव के दौरान मीडिया के सामने कुछ बोलने का सुझाव दिया जो उन्हें पसंद नहीं आया और कहने लगी नहीं मैं अपने स्वार्थ के लिए ऐसा नहीं बोल सकती | जो होगा सो होगा |लेकिन लेकिन आप पूरे चुनाव में मेरे लिए मीडिया का काम देखेंगे |और लगभग सभी बड़े अख़बारों के लिए मैंने उनके इन्टरव्यू लिए | इतने बड़े कद की नेता होने के बावजूद उनकी नम्रता और शालीनता के उनके विरोधी भी कायल थे | तमाम विरोध के बावजूद वे अपने धुर विरोधियों को भी गले लगाने में पीछे नहीं हटती थी | छोटी मोटी बातो को तो वे इग्नोर ही करती थी | निजी सम्बन्ध निभाने में उनका कोई सानी नही था | उनके मुख्यमंत्री काल में जब भी मैं उनसे मिलता था देखते ही एक ही सवाल करती थी क्या बात है बहुत कमजोर लग रहे हो, और मैं हमेशा कहता था नहीं ऐसा नहीं है मैं तो पहले से भी दुरुस्त हूं तो वे मुस्करा कर आगे बढ़ जाती थी | एक बार नही जब यह बात उन्होंने करीब बीस मुलाकातों के दौरान कही तो मेरे पत्रकार साथी हंसते थे और कहते थे शीला जी आपसे मजाक करती हैं | मैं उनको लेकर शीला जी के पास पहुंचा और पूछा मैं तो हष्ट पुष्ट हूँ आप ऐसा क्यों कहती हैं ये लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं तो शीला जी ने जो जवाब दिया उसे सुन सबकी आंखे नम हो गई वे कहने लगी बच्चा कितना ही हष्ट -पुष्ट हो जाये माँ को कमजोर ही दिखता है | तभी से मैं उन्हें माँ कहने लगा था | और मुझे हमेशा उनमें अपनी माँ की रूह झलकती थी |
शीला जी के जन्मदिन पर हर वर्ष मैं अपने बेटे के साथ उनके घर जाता था शीला जी उसे उसके नाम से पुकारती थी |और अपने हाथों से केक खिलाती थी | इसी साल उसने शीला जी से कहा मैं हर साल आपके जन्मदिन पर आपको विश करने आता हूं लेकिन आप एक बार भी मुझे विश करने नहीं आई तो शीला जी ने कहा आपके पापा नें मुझे कभी बताया ही नहीं इस बार जरुर आऊँगी बताओ कब है आपका जन्मदिन | शीला जी ने अपनी निजी डायरी में वो डेट नोट की और मुझे कहा इस बार मुझे याद दिलाना इसकी शिकायत दूर करूंगी | लेकिन अपने प्यारे विशु से किया वायदा नहीं निभा पाई शीला जी और उसके जन्मदिन से पहले ही हमसे बहुत दूर चली गयी | आज बस इतना ही यूं तो धरती पर आता है हर कोई मरने के लिए, मगर मौत उसकी जिसे जमाना याद करे | ईश्वर शीला जी को अपने श्री चरणों में स्थान दें और हमें यह दुःख सहन करने की शक्ति |

                                                                    ॐ शांति ॐ

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