पंजाब के साथ भी हो सकते हैं दिल्ली में चुनाव

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नई दिल्ली ( अश्वनी भारद्वाज )
हैड लाइन पढ़कर आप सोच रहें होगें आज क्या हो गया है इस लेखक को | सूत ना कपास और जुलाहे से लठ्ठम लठ | यानि अभी ना तो चुनाव की कोई चर्चा ना ही कोई सम्भावना | लेकिन यह सच है की राजनीती में कब क्या हो जाये हालात कब पलटी मार दें कोई नहीं जानता | और अपनी दिल्ली की सियासत की बात ही अलग है | शायद हालात को भांप कर ही दिल्ली भाजपा के प्रधान सतीश उपाध्याय ने कार्यकर्ताओं से चुनाव के लिए कमर कसने को कहा है | लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज अरविन्द केजरीवाल कब कौन सा दावं खेल दें किसी को कानो कान खबर नहीं लगने वाली |
            लाभ के पद के मामले में शिकंजे में आये अरविन्द के 21 सैनिक चुनाव आयोग की लम्बी कवायद के बाद यदि लपेटे में आते हैं तो क़ानूनी लड़ाई भले ही कुछ माह और लटक जाये लेकिन आप के सेनापति अरविन्द 21 के बजाए 70 को ही चुनावी जंग में उतार भाजपा व कांग्रेस को घेर सकते हैं | पंजाब में आज की तारीख में अरविन्द सेना बादल सेना से काफी आगे है | कांग्रेस भी काफी पीछे है, दिल्ली में भले ही अरविन्द के सैनिकों ने उन्हें भँवर में उलझाया हुआ है | लेकिन चुनावी पाशा फैंक अरविन्द हालात बदलने में माहिर है | हालात कैसे बदलेंगे वो हम आपको चुनाव घोषित होने के बाद बताएंगे |
            हालाँकि अभी यह बात किसी के गले उतरनी आसान नहीं हैं | लेकिन अरविन्द अपनी सेना को घिरते देख कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटने वाले | यह लगभग साफ हो गया है की 21 संसदीय सचिव वाला मामला अरविन्द के काबू के बाहर जा चुका है | और इसमें कोई दिस-दैट की गुंजाइश बची नहीं है | आज नहीं तो कल इसमें फैसला केजरी सेना के खिलाफ ही जाना है |
               ऐसे में जो नया मामला रोगी कल्याण समितियों की चेयर मैनी  का सामने आया है उसमे भी 18 विधायकों की सदस्यता पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं | ऐसे में माना जा रहा है 21 +18 जो कि 39 बहुमत से चार ज्यादा बनते हैं दूसरे पाले में हो जायेंगे | सदन में तीन सदस्य भाजपा के भी हैं | वहीं कम से कम तीन पहले से ही आप सेना में विद्रोह का बिगुल बजा रहें हैं जिनकी संख्या और भी ज्यादा हो सकती  है और उनके आगे अरविन्द के झुकने का सवाल ही नही उठता |
               ये सारे समीकरण अरविन्द की उंगलियों पर है ऐसे में अरविन्द सरकार गिरने और फिर और फिर उसे बचाने का इंतजार करें ऐसा सम्भव नही दिखता | अरविन्द को नजदीक से जानने वाले जानते हैं वो इतना लंबा सब्र करने वाले नहीं हैं | इधर चित और उधर पट की रहा पर चलने वाले अरविन्द जनता की नब्ज भी अच्छी तरह से जानते हैं | उन्हें मालूम है पहले 21 और बाद में 18 के बाद उनका और उनकी सरकार का क्या हश्र होगा लिहाज़ा वे 21  के बाद इंतजार करें इसकी सम्भावना कम ही है |
               सूत्रों का मानना है यदि 21 की बाजी केजरी सेना हारती है तो केजरी 18 के रिजल्ट के इंतजार के बजाए पंजाब के साथ ही 21 के नहीं बल्कि 70 के  चुनाव कराना चाहेंगे | ताकि दिल्ली के साथ -साथ पंजाब में भी शहादत को मुद्दा बनाया जा सके |
              यदि ये हालात बनते हैं तो पंजाब में भी अरविन्द लाभ की  पोजीशन में रहेंगे और दिल्ली में भी थोड़े नुकसान के बाद उनकी वापसी की राहआसान होगी | दूसरे शब्दो में दिल्ली सियासत पंजाब में भुनाई जा सकेगी और पंजाब के माहौल का लाभ दिल्ली में मिलेगा |

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